बस नज़र ही तो गुस्ताख़ थी साहब।
वरना कौन, किससे क्या ख़ूब था।।

किसी को हीरो की परवाह ना थी।
कुछ ने पत्थर का हीरो में बदला रूप था।।

किसी ने राह में कठिनाइयों को काँटों से आंका।
कुछ को काँटों की सेज में ही सुकून का पल था।।
बस नज़र ही तो गुस्ताख़ थी साहब।
वरना कौन, किससे क्या ख़ूब था।।

By: Jeet

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